स्पेशल डेस्क : खूबसूरत मानसून के लिए मशहूर केरल के लिए इस बार की बारिश कहर बन कर बरसी। लाखों को बेघर हुए और अरबों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ और अब केरल को नए सिरे से खड़ा करने की कवायद चल रही है।

इन सब के बीच एक खास बात निकल कर सामने आई वो ये की खाड़ी के मुस्लिम देशों ने केरल के अपना दिल और खजाना दोनों खोल दिया। भले ही भारत सरकार ने अरब देशों की मदद को लेने से इनकार कर दिया हो लेकिन एक चर्चा फिर शुरू हो गयी की आखिर मुस्लिम देशों में केरल के लिए इतना लगाव क्यों है।

ये बात उस वक़्त और भी महत्वपूर्ण हो गयी जब केरल की बाढ़ पर एक विवादस्पद टिप्पणी को लेकर ओमान की कंपनी ने अपने कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया।

केरल में बढ़ते मुस्लिम प्रभाव को लेकर विवाद उठता रहा है। कभी लव जिहाद जैसी बात को लेकर तो कभी युवाओं के आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल होने के लेकर।

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केरल के प्रति मुस्लिम देशों के प्रेम की कहानी यहाँ से शुरू होती है

केरल से खाड़ी के देशों के संबंध चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभिक दौर में ही शुरू हो गए थे। तब अरब के व्यापारी मसाले के व्यापार के लिए आते थे। अरब के लोग न केवल मसालों के व्यापार के लिए आते थे बल्कि वे तटीय इलाकों पर यहां के लोगों से घुलने-मिलने भी लगे। मोरक्को के रहनेवाले इब्ने बतूता भी 14वीं शताब्दी में केरल आए थे। इसी तरह केरल के नाविकों ने भी अरब के व्यापारियों के साथ वहां जाना शुरू किया। इसी के साथ यहाँ इस्लाम ने प्रवेश किया।

केरल में इस्लाम की जड़ में हजारों मील की यात्रा है जो खाड़ी-अरब देशों से होकर इस जमीन पर सदियों पहले पहुंची थी। आज राज्य की अर्थव्यवस्था में केरल के मुस्लिम कारोबारियों का अहम योगदान है। राज्य से बड़ी संख्या में लोग अरब देशों में काम के लिए जाते रहते हैं। अरब देशों से केरल का इसी वजह से खास रिश्ता बन गया है।

पैगम्बर मुहम्मद का काल

केरल में इस्लाम पैगंबर मुहम्मद के वक्त अरब व्यापारियों के माध्यम से (CE 570 – CE 632) के बीच पहुंचा। इस्लामिक काल से पहले से भी केरल का मध्य पूर्व के साथ एक बहुत ही प्राचीन संबंध था। मुस्लिम मर्चेंट मलिक दीनार 7वीं सदी में केरल में ही आकर बस चुका था और उसी ने यहां सबसे पहले इस्लाम से लोगों को परिचित कराया। चेरामन जुमा मस्जिद जिसे भारत की पहली मस्जिद कहा जाता है वह कोडुंगलूर तालुक में स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि चेरा राजवंश का आखिरी राजा चेरामन पेरुमल ने भी इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था वह पैगंबर मोहम्मद से मिलने भी गया था। पेरुमल ने इस्लाम के प्रचार प्रसार में भी काफी सहयोग किया।

कहा जाता है कि भारत और अरब देशों के बीच पैगंबर मोहम्मद के समय से पहले ही कारोबारी रिश्ते कायम हो चुके थे। यहूदी और ईसाई देशों से अलग, अरब के लोग काफी पहले ही भारत के पश्चिमी घाट पर आकर डेरा जमा चुके थे। ऐसे प्रमाण हैं कि अरब मूल के लोग 8वीं और 9वीं शताब्दी में ही केरल में बसने लगे थे। हालांकि, कई जगह ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि पश्चिम एशिया से केरल में पहुंचने वालों में मुस्लिम कारोबारी पहले नहीं थे। ऐसा यहां के मसालों की वजह से था। यूरोपीय और अरब कारोबारियों को ये जगह भारी मुनाफे की वजह से लुभाती रही थी।

कई पुस्तकों में उल्लेख है कि इस्लाम के जन्म से बहुत पहले, अरब कारोबारियों के जहाज केरल में पहुंचने की परंपरा रही है। ऐसा कहा गया है कि यहूदी और ईसाई वहां पहुंचने वाले पहले लोग थे। मुस्लिम इनके बाद ही केरल पहुंचे थे। हालांकि, बाद के वर्षों में केरल में यहूदी तो नहीं बढ़े लेकिन ईसाई-मुस्लिम यहां बढ़ते गए और इसी के साथ बढ़ता गया उनका प्रभाव, जो आज भी राज्य में है।

केरल और मुस्लिम देशों के बीच कारोबार वक्त के साथ बढ़ता जा रहा था और मुस्लिम कारोबारी भी इस राज्य में आने लगे थे। कालीकट के राजा सभी का स्वागत कर रहे थे। राजा ने इन कारोबारियों के स्थानीय महिलाओं से विवाह के लिए प्रेरित किया। राजा की कोशिशों से ये मुस्लिम कारोबारी सैन्य बलों में काम करने के लिए भी तैयार हो गए। यहां चेर राजवंश के चेरामन पेरुमल का जिक्र करना जरूरी है। पेरुमल ने न सिर्फ इस्लाम धर्म कबूला बल्कि मक्का भी गए। मालाबार इलाके के मुस्लिमों में अरब मुस्लिम मलिक दिनार को लेकर बेहद सम्मान का भाव था। मलिक दिनार केरल में इस्लाम को आगे बढ़ाने के मकसद से आया था। मलिक दीनार ने पहली मस्जिद करेंगनोर में बनाई। इसके बाद मलिक दिनार ने क्विलोन, मडाई, कासरगौड, श्रीकांतपुरम, धर्मपट्टनम और चालियम में मस्जिदों को निर्मित कराया।

केरल में इब्न बतूता

गाना आपने सुना इब्न बतूता बगल में जूता ऐसा इसलिए क्योंकि जिन्होंने अपनी जिज्ञासा और जुनूनी के दम पर अपने क़दमों से आधी से ज़्यादा दुनिया नाप दी। इनकी कहानी हम बाद में सुनायेंगे अभी केरल पर ही फोकस करते हैं।

इब्न बतूता ने अपने जीवनकाल में 1342 से 1347 तक का काल केरल में बिताया और राज्य के अलग अलग हिस्सों में मुस्लिमों की जीवनशैली का उसने विवरण दिया है। इब्न बतूता ने कालीकट से क्विलोन तक 10 दिनों तक यात्रा की। उसने लिखा, ‘जहां ठहरने की जगहें थी वहां मुस्लिमों के घर थे। इन घरों में मुस्लिम यात्रा ठहरते थे। वह खाने पीने का सामान भी खरीदते थे। राज्य में मुस्लिम सबसे सम्मानित लोग थे। बता दें कि 15वीं, 16वीं और 17वीं शताब्दी में मुस्लिम केरल में न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत हुए बल्कि उनकी संख्या भी बढ़ी। समाज में अस्पृश्यता का दंश झेल रहे कई लोग इस्लाम के प्रति आकर्षित हुए। 12वीं शताब्दी के एक समय केरल में मुस्लिम शासक भी रहा था।

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25 फ़ीसदी से ज्यादा है मुस्लिम आबादी

केरल के मुस्लिमों को मप्पिला कहा जाता है। ये सभी मलयालम भाषा ही बोलते हैं और अरब संस्कृति के मिश्रण के साथ साथ मलयालम संस्कृति का पालन करते हैं। केरल में इस्लाम दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। पहले नंबर पर हिंदू धर्म है। केरल में मुस्लिम आबादी 25 फीसदी से अधिक है जो देश के किसी भी राज्य से अधिक आंकड़ा है। केरल में इस्लाम इस वक्त तेजी से बढ़ रहा है।

जब 1950 के दशक में फ़ारस की खाड़ी में पेट्रोलियम का विशाल भंडार मिला तो आर्थिक और व्यापार के नए मौक़े अचानक से बढ़ गए। यह केरल के लोगों के लिए भी रोज़गार के लिए बेहतरीन मौक़ा था और इन्होंने इस अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया।

विदेशी मुद्रा भेजने में केरल सबसे आगे

भारत दुनिया के उन देशों में शीर्ष पर है जहां के विदेश में रहने वाले नागरिक अपने देश में सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा भेजते हैं। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया भर के भारतीय प्रवासी जितनी विदेशी मुद्रा अपने देश में भेजते हैं, उतनी किसी भी देश के प्रवासी नहीं भेजते हैं। 2017 में भारतवंशियों ने 69 अरब डॉलर भेजा जो पाकिस्तान की अभी की कुल विदेशी मुद्रा भंडार से सात गुना से भी ज़्यादा है। इसके साथ ही यह भारत के 2018-19 के रक्षा बजट से डेढ़ गुना ज़्यादा है।

1991 की तुलना में भारतीय प्रवासियों से देश में आने वाली विदेशी मुद्रा में 22 गुने की बढ़ोतरी हुई है। 1991 में यह राशि महज़ तीन अरब डॉलर थी।

इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार भारवंशियों की तरफ़ से देश में भेजे जाने वाली कुल विदेशी मुद्रा में केरल का सबसे बड़ा योगदान होता है।

इसमें केरल का 40 फ़ीसदी हिस्सा होता है जबकि पंजाब 12.7 फ़ीसदी के साथ दूसरे नंबर पर, तमिलनाडु (12.4 फ़ीसदी) तीसरे नंबर पर, आंध्र प्रदेश (7.7 फ़ीसदी) चौथे नंबर पर और 5.4 फ़ीसदी के साथ उत्तर प्रदेश चौथे नंबर पर है।

केरल से खाड़ी देशों में पलायन

केरल की कुल तीन करोड़ आबादी है और इसके 10 फ़ीसदी लोग अपने प्रदेश में नहीं रहते हैं। सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट स्टडीज का कहना है कि केरल से खाड़ी के देशों में पलायन कोई नया नहीं है।

सीडीएस के अनुसार, ”केरल भारत का एकलौता राज्य है जहां से खाड़ी के देशों में पिछले 50 सालों से पलायन जारी है। केरल के लोगों का खाड़ी के देशों में एक मजबूत नेटवर्क है। यहां हर किसी का कोई न कोई चाचा या मामा रहता ही है।”

खाड़ी देशों में छपता है केरल का अखबार

केरल में शहरीकरण की जो तेज़ रफ़्तार है उसके पीछे केरल के उन लोगों की कड़ी मेहनत है जो परिवार से दूर खाड़ी के देशों में रहकर अपने देश में पैसे भेजते हैं। केरल की फ़िल्मों और वहां के साहित्य में भी खाड़ी के देशों में पलायन और वहां से आई समृद्धि का असर साफ़ दिखता है।

माध्यमम मलयालम भाषा का दैनिक अख़बार है और यह खाड़ी के देशों से भी छपता है। इसे भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय अख़बार कहा जाता है। इसके कुल 19 संस्करण में से 6 संस्करण खाड़ी के देशों से छपते हैं। खाड़ी के देशों में मलयालम भाषा में छपने वाले प्रकाशनों में केरल की उन पत्नियों का ज़िक्र प्रमुखता से होता है जो पति के विदेश जाने की वजह से अकेलेपन का सामना कर रही हैं।

अकेली रहती हैं महिलाएं

सीडीएस की स्टडी के अनुसार केरल में ऐसी 10 लाख महिलाएं हैं जिनके पति खाड़ी के देशों में काम कर रहे हैं और वो अकेले जीवन बिताने के लिए विवश हैं। केरल में मलयालम भाषा के हर टीवी चैनल पर आधे घंटे के लिए खाड़ी के देशों पर केंद्रित कार्यक्रम ज़रूर प्रसारित किया जाता है।

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भारतीय विदेश मंत्रालय के 2015 के आंकड़ों के अनुसार इस साल 7 लाख 81 हज़ार लोग काम के लिए विदेश गए, जिनमें से 96 फ़ीसदी लोग सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत, क़तर और ओमान गए। मानव विकास सूचकांक में सभी भारतीय राज्यों में केरल सबसे आगे है तो इसमें सबसे बड़ा योगदान खाड़ी के देशों से आने वाली कमाई का है।

अगर केरल में खाड़ी के देशों के रोज़गार को छोड़ दें, तो वहां भारी बेरोज़गारी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इंडस्ट्रियल रैंकिंग में केरल 12वें नंबर पर है। सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट स्टडीज़ का कहना है कि 1960 के दशक में केरल की वामपंथी सरकार के भूमि सुधार और 1990 के दशक के बीच खाड़ी के देशों में भारी पलायन हुआ। सीडीएस के अध्ययन का कहना है कि केरल में इसी दौरान बेरोज़गारी का ग्राफ सबसे ऊपर रहा है।

सीडीएस का कहना है कि खाड़ी के देशों में पलायन से केरल की पूरी तस्वीर बदली है। इस अध्ययन के अनुसार, ”यहां की अर्थव्यवस्था, ज़मीन की क़ीमत और जीवन शैली में बड़ी तब्दीली आई। अच्छे घर बने, ज्वेलरी की बड़ी संख्या में दुकानें खुलीं और नौकरियां देने वाली एजेंसियों की होर्डिंग्स लगाई गईं जिन पर लिखा होता था- नौकरी, पढ़ाई और पलायन।

केरल की संपन्नता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि तीन करोड़ आबादी वाले राज्य में तीन अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट हैं जबकि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में दो ही अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट हैं।

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2012 में केरल में विदेशों से 66 हज़ार करोड़ जमा किए गए। ज़्यादातर पैसे खाड़ी के देशों से भेजे गए। 2013 में इसमें 40 फ़ीसदी की बढ़ोतरी के साथ यह रक़म 90 हज़ार करोड़ पहुंच गई। 2014 में इसमें केवल 14 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह राशि 1.4 अरब तक पहुंच गई।

2015 में इसमें 22 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई। खाड़ी के देशों जो केरल के लोग मज़दूरी का काम करते हैं वो अपनी कमाई से वापस आने पर सोना ख़रीदते हैं। सीडीएस का कहना है कि जब उनके पैसे ख़त्म होते हैं तो सोना बेचना शुरू कर देते हैं।

केरल का अरबीकरण

केरल में धर्म परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है। केरल में कट्टरवादी सलफ़ी इस्लाम को फैलाने में अरब से लौटे केरल के लोगों का हाथ बताया जाता है। खाड़ी के देशों में केरल के जितने लोग होते हैं, उनमें सबसे ज़्यादा मुस्लिम होते हैं। इनकी कमाई से केरल की अर्थव्यवस्था पर ही केवल प्रभाव नहीं पड़ा है बल्कि यहां की संस्कृति में भी तब्दीली देखने को मिल रही है।

इसकी मुख्य वजह ये है कि इनके परिजन बड़ी संख्या में मध्य-पूर्व में रहते हैं। जैसे बाक़ी भारत का पश्चिमीकरण हुआ है उसी तरह से केरल के मुसलमानों का अरबीकरण हो रहा है। जो भारतीय इंग्लैंड में रहते हैं उनकी जीवनशैली में भी अंग्रेज़ीपन साफ़ दिखता है। इसी तरह से केरल के मुसलमान अपने घरों में अरबी जीवन शैली तेज़ी से अपना रहे हैं।

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