नई दिल्ली : पिछले पांच सालों में एक कॉलेज पास आउट फ्रेशर लड़के की गिनती अब देश के गिने चुने नेताओं में होने लगी है। लोकप्रियता का ग्राफ़ इस तरह बढ़ा कि उनके चर्चे राष्ट्रीय राजनीति में भी होने लगे हैं। तीन साल के सार्वजनिक जीवन में राजद्रोह के आरोप में उन्हें नौ महीने जेल में रहना पड़ा, निर्वासन का सामना करना पड़ा और छह महीने पड़ोसी राज्य में गुज़ारना पड़ा। ये प्रोफाइल है गुजरात के पाटीदार आन्दोलन से उभरे हार्दिक पटेल का।

वैसे आन्दोलन से उभरे हार्दिक अकेले नेता नहीं हैं इसमे बतौर सीनियर अरविन्द केजरीवाल का नाम भी शामिल किया जा सकता है।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि हार्दिक की लोकप्रियता जिस तरीके से बढ़ी है, शायद ही किसी नेता ने इतने कम समय में इतनी लोकप्रियता हासिल की हो।

हार्दिक पटेल वो युवा हैं जिसने वर्तमान भारतीय राजनीति के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले नरेंद्र मोदी के गढ़ गुजरात में उनके लिए खासी चुनौती पैदा की है। हार्दिक हमेशा कहते रहे हैं कि वो एक नेता नहीं बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वो जो भी करते हैं उसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में होती है।


अपने आन्दोलन के शुरूआती दिनों में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वो सक्रिय राजनीति में नहीं आना चाहते हैं। वो शिवसेना के बाला साहेब ठाकरे की तरह बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा था, “मैं किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ना नहीं चाहता, लेकिन मैं किंग मेकर की भूमिका में रहना चाहता हूं।”

लेकिन जब आज वे औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं तो क्या ये कहा जाये कि क्या किंगमेकर की भूमिका की चाहत रखना उनकी अपरिपक्वता थी।  

हालांकि कांग्रेस से उनकी नजदीकियों की चर्चा शुरुआत से ही होती रही हैं। लेकिन पिछले साल राहुल गाँधी के नेतृत्व को लेकर उन्होंने ये भी कहा था, मैं राहुल गांधी को व्यक्तिगत स्तर पर पसंद करता हूं लेकिन मैं उन्हें नेता नहीं मानता क्योंकि वह मेरे नेता नहीं हैं।

ये जवाब उस सवाल के बदले में दिया गया था जब गुजरात विधानसभा चुनावों में पाटीदार समुदाय के आरक्षण के लिए उन्होंने कांग्रेस का समर्थन किया था।

लेकिन ये राजनीति है यहां बयान और किरदार वक़्त के साथ बदलते रहते हैं। कांग्रेस को हार्दिक में मोदी को चुनौती देने वाला चेहरा दिख रहा है। हार्दिक की पहली प्राथमिकता थी पाटीदारों को आरक्षण। कांग्रेस ने हार्दिक से पाटीदारों को आरक्षण का वादा किया था। लेकिन राज्य की सत्ता पर कांग्रेस काबिज नहीं हो पायी। तो क्या अब हार्दिक सिर्फ आरक्षण की मांग के अलावा अपना सियासी करियर भी साधने में जुट गए हैं।

कांग्रेस को कितना फायदा?

आरक्षण के लिए शुरू हुआ भाजपा विरोध उन्हें कांग्रेस के करीब ले गया। विधासनभा चुनावों के दौरान फायदा कांग्रेस को मिला। 182 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा 99 पर सिमट गई।

गुजरात में पाटीदारों की राजनीति काफी अहम है। गुजरात की कुल जनसंख्या में करीब 15% आबादी पटेलों की है जिनकी गिनती राज्य के सबसे संपन्न समुदाय में होती है। विधानसभा चुनाव में हार्दिक ने इन्हीं पाटीदारों से कांग्रेस का समर्थन करने की अपील की थी, जिसका लाभ कांग्रेस को मिला भी था। कांग्रेस को कुल 77 सीटें मिलीं थीं।

इस समर्थन की वजह थी आरक्षण का वादा। लेकिन क्या हार्दिक के कांग्रेस में शामिल होने के बाद भी पाटीदार समाज कांग्रेस को वोट करेगा तो इसमें भी संदेह है।

वजह क्या ?

हार्दिक पटेल की वजह से छिटक रहे अपने परंपरागत पटेल मतों को साधने के लिए भाजपा अब पाटीदार समाज के बीच माधव सिंह सोलंकी के शासन की याद ताजा कराएगी। सोलंकी के शासन में पटेल न सिर्फ सत्ता में दरकिनार थे बल्कि उन पर जुल्म और ज्यादती के मामले भी बढ़े थे। उनके शासन की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप ही भाजपा ने पटेलों की अस्मिता को उभारकर केशुभाई पटेल को आगे कर राज्य में अपनी पैठ बनाई थी। तब से ही पटेल समुदाय भाजपा का परंपरागत मतदाता रहा है। अब माधव सिंह सोलंकी के बेटे भरत सोलंकी कांग्रेस अध्यक्ष हैं। इसलिए पाटीदार अब भी उस उपेक्षा को भूले नहीं हैं।

विधानसभा चुनाव के समय हार्दिक कांग्रेस में नहीं थे, इसलिए उन्हें पाटीदारों का समर्थन मिला। अब कांग्रेस में शामिल होने के बाद अगर हाईकोर्ट से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए हरी झंडी मिलती है तो उनके लिए अपनी सीट बचाना भी मुश्किल हो सकता है।

कुल मिलाकर हार्दिक अपनी राजनीति पारी की शुरुआत करना चाहते हैं, लेकिन उनके सामने खुद की खड़ी की हुई मुश्किलें भी खूब हैं। ऐसे में वे खुद को बचाएंगे या कांग्रेस का फायदा करवा पाएंगे, ये देखना बड़ा दिलचस्प होगा।

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