नई दिल्ली : हिंदू परंपरा में विवाह से पहले भावी वर-वधू की कुंडलियों का मिलान किया जाता है। दोनों की कुंडलियां इसलिए मिलाई जाती है ताकि उनमें किसी प्रकार का दोष ना हो और वे विवाह के बाद सुखद दांपत्य जीवन बिता सके, उनकी संतानें स्वस्थ हों और उनका आपसी तालमेल अच्छा रहे।

कुंडली मिलान की प्रक्रिया के दौरान मंगल दोष या अन्य ग्रह जनित दोष तो देखे ही जाते हैं, एक सबसे बड़ा दोष जो माना जाता है, वह है नाड़ी दोष। ब्राह्मण और वैश्यों में नाड़ी दोष को मंगल दोष के समान ही महत्वपूर्ण माना जाता है और यदि यह दोष भावी वर-वधू के गुण मिलान में पाया जाता है तो वह विवाह नहीं किया जाता है।

वैदिक ज्योतिषियों का मानना के नाड़ी दोष होने के बाद भी यदि विवाह कर दिया जाए तो दांपत्य जीवन में पति या पत्नी को कई तरह के शारीरिक रोग होने की आशंका रहती है। उनकी संतानों में रक्त संबंधी कोई गंभीर रोग उत्पन्न् हो जाता है या कई मामलों में तो ऐसे दंपतियों को संतान सुख मिल ही नहीं पाता है।

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क्या होता है नाड़ी दोष ?

विवाह से पूर्व लड़का और लड़की की कुंडली मिलान की प्रक्रिया के तहत ही उनके गुणों का मिलान भी किया जाता है, जिसे मेलापक मिलान भी कहा जाता है। इसके तहत आठ बिंदुओं के आधार पर गुणों का मिलान किया जाता है। इन गुणों के कुल 36 अंक होते हैं। इनमें से सुखद विवाह के लिए आधे यानी 18 गुणों का मिलना आवश्यक है। इनमें भी नाड़ी दोष नहीं होना चाहिए।

गुण मिलान के दौरान जो आठ बिंदु होते हैं उन्हें कूट या अष्टकूट भी कहा जाता है। ये आठ कूट हैं वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी। नाड़ी तीन प्रकार की होती है, आद्य नाड़ी, मध्य नाड़ी तथा अंत्य नाड़ी। प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुंडली में चंद्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में उपस्थिति से उस व्यक्ति की नाड़ी का पता चलता है। कुल 27 नक्षत्रों में से नौ विशेष नक्षत्रों में चंद्रमा के होने से जातक की कोई एक नाड़ी होती है।

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किस नक्षत्र से कौन सी नाड़ी?

आद्य नाड़ी : चंद्रमा जब अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा तथा पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में हो तो जातक की आद्य नाड़ी होती है।

मध्य नाड़ी : चंद्रमा जब भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्व फाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा तथा उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में हो तो जातक की मध्य नाड़ी होती है।

अंत्य नाड़ी : चंद्रमा जब कृत्तिका, रोहिणी, अश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती नक्षत्र में हो तो जातक की अंत्य नाड़ी होती है।

कब होता है नाड़ी दोष

गुण मिलान करते समय यदि वर और वधू की नाड़ी एक ही आ जाए तो नाड़ी दोष बनता है और इसके लिए उन्हें 0 अंक मिलते हैं। उदाहरण के लिए यदि लड़के की नाड़ी आद्य हो और लड़की की भी आद्य आ जाए तो नाड़ी दोष बन जाता है। ऐसी स्थिति में विवाह करना उचित नहीं होता है।

कब नहीं होता नाड़ी दोष

  • यदि लड़का और लड़की दोनों का जन्म एक ही नक्षत्र के अलग-अलग चरणों में हुआ हो तो नाड़ी एक होने के बाद भी दोष नहीं होता।
  • यदि लड़का और लड़की दोनों की जन्म राशि एक ही हो, लेकिन नक्षत्र अलग-अलग हों तो नाड़ी एक होने के बाद भी नाड़ी दोष नहीं बनता।
  • यदि लड़का और लड़की दोनों का जन्म नक्षत्र एक ही हो, लेकिन जन्म राशियां अलग-अलग हों तो नाड़ी दोष नहीं बनता।

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