तिरुवनंतपुरमः सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद बुधवार से केरल के बहुचर्चित सबरीमाला मंदिर के द्वार सभी उम्र की महिलाओं के लिए खुलने जा रहे हैं। इस फैसले को लेकर केरल में सियासी घमासान मचा हुआ है। कई संगठन और राजनीतिक दल मंदिर में महिलाओं की एंट्री के विरोध में हैं। बीजेपी ने मार्च निकालकर केरल सरकार का विरोध भी किया है। ऐसे में राज्य में तनाव का माहौल है। हालांकि, पुलिस-प्रशासन ने महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा दिया है। तनाव की स्थिति को देखते हुए पुलिस विभाग ने सरकार से अतिरिक्त फोर्स की मांग भी की है।

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के निर्णय के बाद विरोध कर रहे 50 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। गिरफ्तार किये गये लोगों में त्रावणकोर देवस्थान बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन भी शामिल हैं। इससे पहले मंदिर के करीब पहुंची दो महिलाओं को प्रदर्शनकारियों ने आगे जाने से रोक दिया। इनमें केरल की पत्रकार लिबी सीएस भी शामिल थीं। हिंसा की आशंका को देखते हुए यहां पांच किमी के दायरे में हजारों पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरोध में सामूहिक आत्महत्या की धमकी

सुप्रीम कोर्ट ने 12वीं सदी के भगवान अयप्पा के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। केरल सरकार ने कहा है कि हम कोर्ट के आदेश को लागू करेंगे। लेकिन, पूरे राज्य में अदालत के फैसले का विरोध किया जा रहा है। हंगामे और सामूहिक आत्महत्या की धमकी भी दी गई है। फैसले का विरोध करने वालों में महिलाएं भी शामिल हैं।

टीडीबी और राजपरिवार की बैठक में नहीं निकला नतीजा

त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) और पंडालम राजपरिवार के सदस्यों के बीच मंगलवार को अहम बैठक हुई। इस बैठक में कोई भी नतीजा नहीं निकल सका, क्योंकि टीडीबी ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने से इनकार कर दिया। बैठक में अयप्पा सेवा संघम और योग क्षेम सभा के सदस्य भी शामिल थे।

महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिये जमा हुए श्रद्धालु

भगवान अयप्पा के सैकड़ों श्रद्धालु मंगलवार को मंदिर के रास्ते में 20 किलोमीटर पहले ही जमा हो गए। इनमें आजीवन ब्रह्मचारी रहने वाली महिला श्रद्धालु भी शामिल थीं। ‘स्वामीया शरणम् अयप्पा’ के नारों के साथ भगवान अयप्पा भक्तों ने 10 से 50 साल की उम्र की लड़कियों और महिलाओं की बसें और निजी वाहन रोक दिए। उन्हें यात्रा नहीं करने के लिए मजबूर किया। ये लोग महिलाओं को मंदिर की ओर जाने से रोक रहे थे। बसों, निजी गाड़ियों में “प्रतिबंधित आयुवर्ग’ की महिलाओं की तलाशी ली गई। मंदिर में दर्शन का कवरेज कर रही महिला पत्रकार ने कहा कि उसे भी श्रद्धालुओं ने रोका, जबकि उसका मंदिर में जाने का कोई इरादा नहीं था।

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने मंगलवार को कहा कि मंदिर में जो भी श्रद्धालु दर्शन के लिए आएगा, उसकी रक्षा की जाएगी। हम किसी को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं देंगे। मेरी सरकार सबरीमाला के नाम पर हिंसा नहीं होने देगी। अगर किसी ने श्रद्धालुओं को मंदिर जाने से रोका तो उसके खिलाफ सख्त कदम उठाया जाएगा।

सबरीमाला का बेस कैम्प कहे जाने वाले नीलक्कल में हालात ज्यादा तनावपूर्ण हैं। यहां हजारों महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध शुरू कर दिया है। एक महिला श्रद्धालु ने कहा कि मासिक पूजा के लिए सबरीमाला के पट कल खोले जा रहे हैं। हम यहां 10 से 50 साल तक की महिलाओं को नहीं जाने देंगे। काली पोशाकों में कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र भी बसों को रोकते हुए दिखाई दिए।

क्या थी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक की वजह

परंपरा अनुसार लोग इसका कारण महिलाओं के पीरियड्स यानि मासिक धर्म को बताते हैं क्योंकि मंदिर में प्रवेश से 40 दिन पहले हर व्यक्ति को तमाम तरह से खुद को पवित्र रखना होता है और मंदिर बोर्ड के अनुसार पीरियड्स महिलाओं को अपवित्र कर देते हैं। ऐसे में लगातार 40 दिन खुद को पवित्र रखना संभव नहीं है। लेकिन महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर रोक की शुरुआत जब हुई तो उसका कारण यह नहीं था।

पीरियड्स से नहीं है संबंध

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, अयप्पा अविवाहित (ब्रह्मचारी) हैं। और वे अपने भक्तों की प्रार्थनाओं पर पूरा ध्यान देना चाहते हैं। साथ ही उन्होंने तब तक अविवाहित रहने का फैसला किया है जब तक उनके पास कन्नी स्वामी (यानी वे भक्त जो पहली बार सबरीमाला आते हैं) आना बंद नहीं कर देते और महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक की बात का पीरियड्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है।

विष्णु और शिव के संगम से हुआ है अयप्पा का जन्म

देवैया लिखते हैं कि पुराणों के अनुसार अयप्पा विष्णु और शिव के पुत्र हैं। यह किस्सा उनके अंदर की शक्तियों के मिलन को दिखाता है न कि दोनों के शारीरिक मिलन को। इसके अनुसार देवता अयप्पा में दोनों ही देवताओं का अंश है। जिसकी वजह से भक्तों के बीच उनका महत्व और बढ़ जाता है।

परंपरावादी कहते हैं कि अगर इस पूर्व कहानी पर लोगों का विश्वास नहीं, तो फिर मंदिर में श्रृद्धा के साथ दर्शन कर क्या फायदा होगा? इसीलिए वे कह रहे हैं कि जज के फैसले से इसपर क्या फर्क पड़ेगा क्योंकि पूर्व कहानी में श्रृद्धा के बिना उन्हें दर्शन से पुण्य नहीं मिलेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here