स्पेशल डेस्क : केंद्र की मोदी ब्रांड सरकार के 4 साल पूरे हो चुके हैं। अच्छे दिन लाने का वादा करने वाली सरकार जन-भावनाओं के अनुरूप कितना खरी उतर पायी है ये तय होने में बस कुछ ही वक़्त बचा है। केंद्र की सत्ता में आने के बाद मोदी-शाह की शाह की जोड़ी ने अपने सफाई अभियान में विपक्ष को साफ करते हुए देश 20 राज्यों को केसरिया रंग में रंग दिया है। इतना ही नहीं पहली बार पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में भी बीजेपी की धमक सुनाई दी है।

साल 2014 में मोदी ने अपने गृह राज्य गुजरात की वडोदरा सीट के अलावा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व कार्ड का मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए महादेव की धरती काशी (वाराणसी) से चुनाव लड़ने का फैसला किया था। इस स्ट्रोक से उन्होंने बेहतरीन पारी खेली और प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 72 बीजेपी के खाते में दर्ज हो गयीं।

लेकिन अब क्या 2019 में पीएम मोदी चुनाव लड़ने के लिए एक दूसरी जगह जा रहे हैं ?

सूत्रों के मुताबिक पीएम मोदी 2019 के लिए एक बार फिर दो सीटों से चुनाव लड़ने का मन बना रहें हैं। कहा जा रहा है की इस बार मोदी ओडिशा के पुरी से लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। पर ऐसे में बनारस का क्या होगा ? ये सवाल लोगों के मन में उठ रहा है।

तो यहाँ हम आपको बता दें कि पुरी के अलावा उनकी दूसरी सीट वाराणसी ही रहेगी। यानी की पीएम मोदी इस बार अपने गृह राज्य से चुनाव नहीं लड़ेंगे। हालांकि ये अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है।

लेकिन सूत्रों के मुताबिक पुरी से पीएम मोदी के चुनाव लड़ने के लिए युद्धस्तर पर तैयारी की जा रही है। पीएम मोदी आज 26 मई को ओडिशा के ही कटक में एक विशाल रैली को संबोधित करेंगे, और चुनाव की रणभेरी फूंकेंगे। बता दें कि इस वक्त बीजे़डी के पिनाकी मिश्रा पुरी से सांसद हैं।

ओडिशा में इस बात की बड़ी चर्चा है। बीजेपी के कई नेता भी ऐसा ही चाहते हैं। उनकी मानें तो मोदी के बहाने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पार्टी के ‘अच्छे दिन’ आ सकते हैं। वैसे तो पुरी से बीजेपी कभी जीत नहीं पाई है। बीजेपी नेताओं को लगता है कि मोदी के जगन्नाथ पुरी आ जाने भर से बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की 105 सीटों पर चुनाव में फ़ायदा हो सकता है।

चार सालों का जश्न ओडिशा में क्यों

नरेंद्र मोदी केंद्र में एनडीए सरकार के चार साल पूरे होने के मौके पर शनिवार को ओडिशा के कटक में एक रैली करेंगे। यह सभा बालियात्रा मैदान में शाम 4 बजे होगी। इसमें वे सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा पेश करेंगे।

अब आप सोच रहे होंगे कि मोदी ने ओडिशा को ही क्यों चुना ? चार साल के सरकार का कार्यक्रम तो उन्हें यूपी या एमपी में करना चाहिए था लेकिन सब जानते हैं कि मोदी ने बिना चुनावी फ़ायदे के ये फ़ैसला नहीं किया होगा। ओडिशा में इन दिनों चर्चा पीएम मोदी के पुरी से चुनाव लड़ने की भी है। पुरी यानी भगवान जगन्नाथ का धाम। मोदी अभी यूपी के वाराणसी से सांसद हैं। वाराणसी यानी काशी विश्वनाथ का धाम। पिछली बार मोदी वाराणसी के साथ साथ गुजरात के वडोदरा से भी चुनाव लड़े थे।

हिंदू समाज की भगवान जगन्नाथ में बड़ी आस्था रही है। पश्चिम बंगाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक हर घर में उनकी पूजा होती है। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले मोदी पुरी आए थे, भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए थे। पीएम बनने के बाद भी वे यहां आए। जगन्नाथ मंदिर के पुजारी ईपसित प्रतिहारी बताते हैं, “ जब गुंडीचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ की पूजा मोदी जी ने की तो उनके गले से फूलों की माला गिर गई थी, तभी हमें लग गया था वे पीएम बनेंगे।”

ओडिशा में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ होने हैं। इसलिए पार्टी का मानना है कि अगर मोदी पुरी से चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा को विधानसभा और लोकसभा में फायदा मिलेगा। ओडिशा में विधानसभा की 147 सीटें हैं। वहीं, लोकसभा की 21 सीटें हैं। इनमें से 20 सीटें बीजू जनता दल (बीजेडी) और एक सीट भाजपा के पास है।

मोदी का तीन साल में ओडिशा का 6वां दौरा

1 अप्रैल 2015 : राउरकेला में सभा की थी। तब भारतीय इस्पात प्राधिकरण का प्लांट का उद्घाटन किया था।

7 फरवरी 2016 : पारादीप में सभा में शामिल हुए थे। इंडियन ऑयल रिफाइनरी का उद्घाटन के साथ पुरी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन और रोड शो किया था।

21 फरवरी 2016 :  मोदी किसान महासम्मेलन में शामिल होने के लिए पश्चिमी ओडिशा के बरगढ़ पहुंचे थे।

2 जून 2016 : को बालासोर में सभा की थी।

5 अप्रैल 2017 : को भाजपा की दो दिवसीय नेशनल एग्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक हुई थी। मोदी इसमें शामिल हुए थे।

नये गढ़ की तलाश

दरअसल बीजेपी ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अपने सीट शेयर को अधिकतम करना चाहती है। इन चारों राज्यों में विस्तार के लिए बीजेपी के पास अभी बहुत संभावनाएं हैं, चारों ही राज्यों में बीजेपी सत्ता में नहीं है। दरअसल देश के कई राज्यों में बीजेपी अपने अधिकतम सीट पा चुकी है। जैसे कि उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान। अब बीजेपी नये राज्यों की ओर अपने जनाधार का विस्तार करना चाहती है।

ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश इन चार राज्यों में लोकसभा की 105 सीटें हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी इसमें से मात्र 6 सीटें जीत पाई थी। इस लिहाज से पार्टी के पास विस्तार की असीम संभावनाएं हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में बीजेपी स्थानीय चुनावों में शानदार प्रदर्शन करते हुए दूसरे नंबर पर आ चुकी है। आंध्र प्रदेश में बीजेपी-टीडीपी की राहें जुदा हो चुकी है। इसके बाद पार्टी बड़े पैमाने पर राज्य में अपना विस्तार कर रही है।

इसकी एक और वजह ये भी है की सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें पाने वाली बीजेपी के सामने 2019 में अखिलेश-माया के गठबंधन की चुनौती है जो बीजेपी की रास्ते में काफी मुश्किलें पैदा कर सकती है जिसका एक नमूना गोरखपुर और फूलपुर जैसे प्रतिष्ठित सीटों को खोकर देखा जा चुका है। इसके अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश के हालत भी बीजेपी के मुफीद नहीं समझे जा रहे हैं इस वजह से मोदी नीत भाजपा अपनी सीटों का कोटा पूरा करने के लिए इन चार राज्यों में अपना दांव खेल सकती है।

धार्मिक संदेश

2019 में अगर नरेंद्र मोदी पुरी से चुनाव लड़ते हैं तो एक धार्मिक संदेश भी है। 2014 में नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में अपनी चुनावी रैलियों में मां गंगा और भगवान शंकर की खूब चर्चा की थी। इस बार अगर पीएम मोदी पुरी से चुनाव लड़ते हैं तो इसे भगवान विष्णु से जोड़ा जाएगा। बता दें कि पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में भगवान विष्णु के कृष्ण रूप (जगन्नाथ) की पूजा होती है। पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात का द्वारका भी कृष्ण से जुड़ा एक अहम तीर्थस्थल है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भगवान विष्णु के ठाकुर रूप की भी पूजा होती है। बीजेपी नेतृत्व इन तमाम धार्मिक प्रतीकों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा। कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद मिल गया तो समझिए सब मिल गया। पुरी से चुनाव लड़ने पर नरेन्द्र मोदी को दिल्ली की गद्दी पर बने रहने का आशीर्वाद मिल सकता है।

पुरी में नहीं खुला है बीजेपी का खाता

पुरी लोकसभा सीट पर बीजेपी कभी जीत नहीं पाई है। पिछले पांच बार से यहां बीजेडी ही जीत रही है। पिनाकी मिश्रा यहां के सांसद हैं। दूसरे नंबर पर हर बार कांग्रेस रही है। बीजेपी को तीसरे नंबर पर ही संतोष करना पड़ता है। लेकिन अगर नरेन्द्र मोदी पुरी से चुनाव लड़े तो राजनैतिक तस्वीर बदल सकती है। बीजेपी नेता और केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान कहते हैं कि “पुरी से मोदी लड़ेंगे या नहीं, ये फ़ैसला तो पार्टी करेगी। इसके लिए पार्टी में संसदीय बोर्ड है”

मोदी लहर के बावजूद ओडिशा में सिर्फ एक सीट

ओडिशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं। पिछले चुनाव में मोदी लहर के बावजूद बीजेपी एक ही सीट पर जीत पाई थी। सुंदरगढ से जीते जोएल ओराम अब मोदी सरकार में मंत्री हैं। तीन सीटों पर जीत हार का फासला बहुत कम रहा। बाक़ी बीस सीटों पर नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल जीत गई। विधानसभा चुनाव में भी बीजेडी को बंपर जीत मिली। 147 में से बीजेडी को 117 सीटें मिली। कांग्रेस के हिस्से में 16 सीटें आयीं।

पंचायत चुनावों में दर्ज कराई उपस्थिति

दस सीटों के साथ बीजेपी ओडिशा विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी रह गई। 2014 के लोकसभा चुनाव में ओडिशा में बीजेडी को 43.4%, कांग्रेस को 25.7% और बीजेपी को 18 फ़ीसदी वोट मिले। लेकिन पिछले साल हुए पंचायत के चुनाव में बीजेपी ने अपने विरोधियों के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी।

आदिवासी बहुल इलाक़ों में बीजेपी को शानदार जीत मिली। ज़िला परिषद के चुनाव में बीजेपी को 297 सीटों पर जीत नसीब हुई। जबकि पिछले पंचायत चुनाव में पार्टी को सिर्फ़ 36 सीटें मिली थी। नवीन पटनायक की पार्टी को 473 सीटें मिली जबकि पिछले पंचायत चुनाव में बीजेडी को 651 सीटें मिली थीं।

पंचायत चुनाव में कांग्रेस को पीछे छोड़ कर बीजेपी ओडिशा में दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। बीजेडी को 40।8%, बीजेपी को 33.03% और कांग्रेस को 18 प्रतिशत वोट मिले। इसके बाद तो बीजेपी ने ओडिशा में नवीन पटनायक के ख़िलाफ़ हल्ला बोल दिया। बात पिछले साल के पंद्रह अप्रैल की है।

बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भुवनेश्वर में थी। पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था, “बीजेपी के लिए स्वर्णिम काल तब आएगा जब ओडिशा, केरल और पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार होगी।”

भुवनेश्वर में रोड शो

पिछले साल अप्रैल में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आए पीएम नरेन्द्र मोदी ने भुवनेश्वर में रोड शो किया था। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान बीजेपी का सीएम चेहरा बन कर प्रचार में जुट गए। अभी नहीं तो फिर कभी नहीं के फ़ार्मूले पर पार्टी काम कर रही है। बीजेपी की नज़र ओडिशा के साथ साथ पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की 105 सीटों पर है।

अगर यूपी और एमपी जैसे राज्यों में नुक़सान हुआ तो इन इलाक़ों से बीजेपी की जान बच सकती है। ऐसे में भगवान जगन्नाथ से बड़ा सहारा मोदी के लिए और कौन हो सकता है ? धर्मेंद्र प्रधान ने उस वक़्त कहा था,  मोदी जी और अमित शाह जी के लिए ओडिशा हमेशा से प्राथमिकता में रहा है। हम इस बार चौंकनेवाले नतीजे ला सकते हैं।

नवीन पटनायक के काम-काज पर सवाल

पिछले साल पंचायत चुनाव के नतीजे आने के पाद बाद से ओडिशा में राजनैतिक घमासान तेज़ हो गया। सीएम नवीन पटनायक के काम काज पर सवाल उठने लगे। वो भी उनकी पार्टी के अंदर से ही। ऐसे असंतुष्ट बीजेडी नेताओं पर बीजेपी डोरे डालने लगी लेकिन नवीन बाबू स्मार्ट निकले। अधिकतर नेताओं को वे लाईन पर ले आए। कभी नवीन बाबू के दाहिने हाथ रहे सांसद जय पांडा पार्टी से बाहर कर दिए गए हैं।

बीजेपी और नरेन्द्र मोदी को रोकने की उनकी अपनी तैयारी है। हाल में ही बीजेपी छोड़ कर बीजू जनता दल के सांसद बने सौम्य रंजन पटनायक कहते हैं, “अगर मोदी जी पुरी से चुनाव लड़ना चाहते हैं तो उनका स्वागत है, लेकिन नवीन बाबू के सामने सब फीके हैं”

अटल के दौर में बीजेडी से था गठबंधन

सात सालों तक बीजेपी और बीजू जनता दल का ओडिशा में गठबंधन रहा, वो दौर अटल बिहारी वाजपेयी का था। 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 7 तो बीजेडी को 9 सीटें मिलीं। साल भर बाद हुए चुनाव में बीजेपी को 9 और बीजेडी को 10 सीटें मिली। 2004 के चुनाव में बीजू जनता दल 11 और बीजेपी 7 सीटों पर जीती। बीजेपी से गठबंधन तोड़ने के बाद नवीन पटनायक ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। पिछले 17 सालों से ओड़िशा में नवीन बाबू का राज है। लेकिन क्या बीजेपी इस बार नवीन पटनायक सरकार के ख़िलाफ़ एंटी इनकंबेंसी का माहौल बना पाएगी ? यही पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। जब नवीन बाबू पहली बार सीएम बने थे तब एक बड़े पत्रकार ने लिखा था, “ओडिशा में भगवान जगन्नाथ के बाद नवीन पटनायक ही वो नाम हैं, जिसे सब जानते हैं।” 18 सालों बाद भी यहां वही हालात हैं न ही कांग्रेस और न ही बीजेपी अब तक उनके लिए चुनौती बन पाए हैं।

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