डेल्टाज, वल्नरेबिलिटी एंड क्लाइमेट चेंज—माइग्रेशन एंड एडप्टेशन (डीईसीएमए) शीर्षक वाले एक ताजा अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि रोजगार की तलाश में सुंदरबन इलाके का युवा वर्ग बड़ी तादाद में पलायन कर रहा है. अध्ययन रिपोर्ट से पता चलता है कि इलाके से विस्थापित होने वाले लोगों में भारी लैंगिक असामनता है.

ग्लोबल वार्मिंग के चलते समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से सुंदरबन बीते लगभग एक दशक से अक्सर सुर्खियां बटोरता रहा है. अब तक इलाके के कई द्वीप पानी में डूब गए हैं. लेकिन भारी जैविक व वानिस्पतिकी विविधता वाले इस इलाके को बचाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है. अब डीईसीएमए रिपोर्ट ने मैंग्रोव यानी सुंदरी के पेडों वाले इस इलाके पर मंडराते खतरे को एक बार फिर रेखांकित कर दिया है.
ताजा अध्ययन

डीईसीएमए रिपोर्ट वर्ष 2014 से 2018 के बीच उत्तर व दक्षिण 24-परगना जिलों के 51 ब्लाकों के सर्वेक्षण के बाद तैयार की गई है. इसमें कहा गया है कि 64 फीसदी लोगों के विस्थापन की वजह आर्थिक है. इनमें खेती से मुनाफा नहीं होना, रोजगार के साधनों की कमी और कर्ज आदि शामिल हैं.
इसके अलावा 28 फीसदी लोग सामाजिक वजहों से विस्थापित हो रहे हैं और लगभग सात फीसदी तूफान और बाढ़ जैसी प्राकृतिक वजहों से. इस अध्ययन में शोघकर्ताओं ने खासकर गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना डेल्टा पर ध्यान केंद्रित किया था. इसके तहत जलवायु परिवर्तन, विस्थापन और बदलती परिस्थितियों के अनुकूल खुद को ढालने जैसे पहलुओं पर निगाह रखी गई थी.

जैवविविधता का केंद्र माना जाता है सुंदरबन का डेल्टा इलाका:

कोलकाता के जाधवपुर विश्वविद्लाय स्थित समुद्र विज्ञान अध्ययन संस्थान के साथ जुड़े डीईसीएमए के भारत प्रमुख प्रोफेसर तुहिन घोष कहते हैं, “इलाके में रोजगार के मौके नहीं के बराबर हैं. ज्यादातर लोग खेती पर निर्भर हैं. लेकिन बाढ़ व तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वजह से खेतों को नुकसान पहुंचने की वजह से विस्थापन लोगों की मजबूरी बन गई है.”

लैंगिक असमानता

अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, विस्थापन करने वालों में भारी लैंगिक असामनता है. ऐसे लोगों में पुरुषों की तादाद महिलाओं के मुकाबले लगभग पांच गुनी ज्यादा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इलाके से विस्थापित होने वालों में 83 फीसदी पुरुष हैं और 17 फीसदी महिलाएं. पुरुष आर्थिक वजहों से विस्थापन कर रहे हैं तो महिलाएं सामाजिक वजहों से. रिपोर्ट से पता चलता है कि विस्थापन के शिकार लोगों में 20 से 30 साल की उम्र तक के पुरुषों व महिलाओं की तादाद ही सबसे ज्यादा है.

प्रोफेसर घोष कहते हैं, “सुंदरबन में कई गांव ऐसे हैं जहां ज्यादातर पुरुष रोजगार की तलाश में दूसरी जगहों पर चले गए हैं और खेती व परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई है. लेकिन इतनी जिम्मेदारी उठाने के बावजूद महिलाएं अपने पति की सलाह के बिना कोई भी फैसला करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं.”

लेकिन सुंदरबन इलाके से विस्थापित होने वाले लोग आखिर जा कहां रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से 51 फीसदी लोग बंगाल की राजधानी कोलकाता पहुंचते हैं. बाकियों में 10 फीसदी महाराष्ट्र, नौ फीसदी तमिलनाडु, सात फीसदी केरल औऱ छह फीसदी गुजरात जाते हैं. इलाके से विस्थापित होने वाले लोगों में 57 फीसदी लोग खास सीजन मसलन त्योहारों और फसलों की कटाई के दौरान रोजगार तलाशने बड़े शहरों में जाते हैं. ऐसे लोग कुछ पैसे कमाकर घर लौट आते हैं. अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवरर्तन की वजह से जिन इलाकों में संकट बढ़ रहा है वहां बदलते हालात के अनुकूल खुद को ढाल पाने में नाकामी भी विस्थापन की एक अहम वजह है.

बढ़ता संकट

वैसे कोई एक दशक पहले से तमाम पर्यावरणविद् सुंदरबन पर मंडराते खतरे के प्रति आगाह करते रहे हैं. भारत बांग्लादेश सीमा पर बंगाल की खाड़ी से सटे इलाके में बसा सुंदरबन मैन्ग्रोव यानी सुंदरी पेड़ों के घने जंगलों से घिरा है. यह दुनिया में रॉयल बंगाल टाइगरों का सबसे बड़ा घर भी है. सुंदरी पेड़ों की वजह से ही इलाके का नाम सुंदरबन पड़ा है. लेकिन रोजगार का वैकल्पिक साधन नहीं होने की वजह से इलाके के द्वीपों पर बसने वाले लोग अब इन सुंदरी पेड़ों को ही निशाना बना रहे हैं. नतीजतन जंगल तेजी से साफ हो रहे हैं. इसी वजह से अब बाघ इन बस्तियों में पहुंच रहे हैं और इंसानों व जानवरों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं.

इसके अलावा लोग जंगल में जाकर शहद बटोरते हैं. वहां भी उनको बाघों का निवाला बनना पड़ता है. हालत यह है कि इलाके में कुछ गांवों को विधवाओं का गांव कहा जाता है. इसकी वजह यह है कि वहां कोई पुरुष ही नहीं बचा है. यह तमाम लोग बाघ का निवाला बन चुके हैं. विशेषज्ञों ने चेताया है कि अगर सुंदरबन में मैंग्रोव के जंगल इसी रफ्तार से घटते रहे तो वर्ष 2030 तक कम से कम 20 द्वीपों का वजूद मिट जाएगा और सत्तर हजार से ज्यादा परिवार विस्थापित हो जाएंगे. प्रोफेसर तुहिन घोष कहते हैं, “बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई के चलते भूमिकटाव की समस्या गंभीर हो रही है. इस पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है.”

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