महिला आरक्षण पर तमाम गतिरोध और विवाद के बीच ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनावों में 33 फीसदी सीटें महिला उम्मीदावारों को देने का ऐलान कर खलबली भले मचाई हो लेकिन ममता इस पर मास्टर स्ट्रोक जड़ दिया है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने कहा कि इस बार पार्टी ने 41 फीसदी टिकट महिला उम्मीदवारों को देने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि यह पार्टी के लिए गर्व का विषय है।

सरकारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का करीब 48 फीसदी हैं लेकिन रोजगार में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 26 फीसदी की है। न्यायपालिका और केंद्र और राज्य सरकारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है। पंचायतों में जहां राज्यों में महिलाओं के लिये आरक्षण किया गया वहां महिलाओं के नाम पर उनके पति और बेटे निर्वाचन से मिली ताकत का उपयोग करते हैं।

महिला सशक्तिकरण में भारत फिसड्डी

यूएनडीपी यानी यूनाईटेड नेशन डेवलपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं के सशक्तीकरण में अफगानिस्तान को छोड़कर सभी दक्षिण एशियाई देश भारत से बेहतर हैं। यह भी एक तथ्य है कि संसद में महिला प्रतिनिधित्व के वैश्विक औसत में भारत का स्थान बहुत नीचे है। 543 सीटों वाली लोकसभा में इस समय 62 महिला सांसद हैं, इससे पहले 2009 में 58 महिलाएं थीं। थोड़ा सा ग्राफ बढ़ा लेकिन 33 फीसदी आरक्षण के हवाले से तो ये नगण्य ही कहा जाएगा। 2010 में यूपीए सरकार ने इसे राज्यसभा में पास तो करा दिया था लेकिन पर्याप्त संख्याबल के बावजूद लोकसभा से पास कराने में विफल क्यों रह गई, ये सवाल बना हुआ है। 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में आई बीजेपी भी इसे भूलती चली गई जबकि ये उसके चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा था।

समाज में घर हो या दफ्तर, सड़क हो या संसद- स्त्रियों के विकास का नारा खूब पीटा जाता है लेकिन महिला हितों को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना या कार्रवाई नहीं दिखती है, जबकि संसद से ही इसकी शुरुआत होती तो ये देश के लिए बड़ा संदेश होता। फिलहाल नवीन पटनायक और ममता बनर्जी के बाद महिलाओं के लिए बाकी दल क्या करेंगे ये देखना अभी बाकी है।

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