स्पेशल डेस्क : भारत में आप इंश्योरेंस को किस तरह से देखते है? ये एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब होगा कि टैक्स बचाने के लिए ही तो हम इंश्योरेंस का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं। जी हां, यही सच है कि हमारे लिए इंश्योरेंस आज भी ज्यादातर मामलों में निवेश का ही एक जरिया है। देश में बीमा कराने को लेकर अभी उतनी गंभीरता नहीं दिखाई जाती।

लेकिन आंकड़े कुछ और ही तस्वीरें बयां कर रहें हैं, आप जिस इंश्योरेंस को निवेश और टैक्स बचाने का एक जरिया मानते हैं, उसी के नियमित प्रीमियम भरने में लगा आपका एक चौथाई पैसा बेकार चला जाता है। इसलिए, देश में इंश्योरेंस खरीदने वालों का पर्सिस्टेंसी रेश्यों बहुत नीचे है। ये पर्सिस्टेंसी रेश्यों ऐसे पॉलिसीधारकों का अनुपात होता है जो इंश्योरेंस खरीदने के एक साल बाद प्रीमियम नहीं देते हैं।

आपको यकीन करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह हकीकत है कि देश की ज्यादातर इंश्योरेंस कंपनियों के कम-से-कम 25 फीसदी पॉलिसीधारक सालभर बाद ही प्रीमियम देना बंद कर देते हैं। एक साल के अंदर पॉलिसी लैप्स होने पर बीमाधारक अपनी लगभग पूरी रकम खो देता है।

यानी, उसे पैसे बिल्कुल भी वापस नहीं होते क्योंकि इंश्योरेंस कंपनियां कमीशन समेत अन्य लागत जोड़कर प्रीमियम की रकम से काट लेती हैं। यह तो सब जानते ही हैं कि देश के इंश्योरेंस बाजार में सरकारी तौर पर पॉलिसी देने वाली कंपनी LIC का बोलबाला है।

अगर हम आपको तकनीकी आंकड़ों में ना उलझाएं तो आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि लोगों ने एक साल (वित्त वर्ष) के अंदर केवल LIC के पास ही 5,000 करोड़ रुपये गवां दिए, और अगर आंकड़ों की बात की जाए तो वित्त वर्ष 2016-17 में LIC ने 22,178.15 करोड़ रुपये मूल्य की रेग्युलर प्रीमियम पॉलिसीज बेची।

यह आंकड़ा देश की पूरी इंश्योरेंस इंडस्ट्री का 44% है। इसमे से 25% लैप्स रेश्यों निकालकर लोगों के पांच हजार करोड़ रूपये LIC के पास ऐसे ही छूट गए हैं। यह कहीं ना कहीं बताता है कि हम लोगों में अभी इंश्योरेंस संबंधी सही जागरूकता का कितना अभाव है।

सही जानकारी के अभाव में एक बार पॉलिसी लेकर पॉलिसीधारक को लगता है कि शायद वह गलत पॉलिसी लेकर फंस गया है। हालांकि, इसमें कपंनियां और इनसे जुड़े एजेंट भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। आलम यह है, कई बार गलत दावे करके पॉलिसी बेच दी जाती है, लेकिन बाद में जब पॉलिसीधारक जांच पड़ताल करता है तो मामला कई बार कुछ और ही निकलता है, इसलिए वह प्रीमियम भरना बंद कर देता है।

वहीं, दुनिया के विकासित देश इस मामले में काफी तरक्की कर चुके हैं। भारत में तेजी के साथ इंश्योरेंस जागरूकता का चलन खासतौर पर बड़े शहरों में तेजी पर है, लेकिन इसके बावजूद छोटे शहरों और खासकर गांवों में बहुत सुधार बाकी है। लोगों और कंपनियों, दोनों को अपने तौर-तरीके बदलने की जरूरत है।

क्योंकि हमारे देश में कई मामलों में परिजनों को भी यह पता नहीं चल पाता कि उनके परिवार के किसी सदस्य ने कितनी पॉलिसी ले रखी हैं, और यह भी देखा जा चुका है वह सदस्य कई बार नियमित रूप से अपना प्रीमियम भी भरते रहते हैं। लेकिन इस बात को लेकर परिवार को अंधेरे में रखने के कारण ही लोगों के निवेश किए गए करीब 15,000 करोड़ रुपये इंश्योरेंस कंपनियों के पास बिना किसी के दावे के पड़े हुए हैं।

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