लखनऊ : देश के सबसे बड़े चुनाव की रणभेरी बज चुकी है आज से ठीक 30 दिन बाद पहले चरण के लिए मतदान होगा लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीती की धरपटक अभी भी जारी है। एक त्रिकोणीय मुकाबले में एक और वो चेहरा है जो अपने को नेता के तौर पर साबित करना चाहता है और इसके लिए उसे किसी की भी मिन्नते करनी पड़े उसे कोई गुरेज नहीं है। एक अड़ियल रवैये वाला चेहरा है जो मोल-भाव का मास्टर है और एक वो चेहरा है जिसके पास अपनी साख बचाने की चुनौती है, वो गठबंधन के दरवाजे से भीतर तो आना चाहता है लेकिन सर झुकाए बिना।

कर्नाटक चुनाव के दौरान की इस तस्वीर को देखिये जब लग रहा था की 2019 के लिए समीकरण बदले हुए नजर आयेंगे और मोदी के लिए किसी को किसी की भी गोदी में बैठने से कोई गुरेज नहीं होगा।

लेकिन यूपी में ‘बहुजन समाजवादी कांग्रेस पार्टी’ के बनने में जो रोज हाँ-ना वाली स्थिति सामने आ रही है उसके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार मायावती को माना जा रहा है।

मायावती के बारे में यह जगजाहिर है कि गठबंधन की राजनीति में दूसरी पार्टियों से अपनी शर्तें मनवाने, भरपूर मोलभाव करने और साझेदार दलों से अपने जनाधार के समर्थन की भरपूर कीमत वसूलने में इसका कोई सानी नहीं है।

माया जानती हैं कि चुनावी राजनीति के लिहाज से कांग्रेस इस समय अपने इतिहास के सबसे नाज़ुक दौर से गुज़र रही है। संख्या के लिहाज से वह लोकसभा में तो दयनीय स्थिति में है ही, साथ ही देश के अधिकांश राज्यों में भी एक-एक करके वह सत्ता से बेदखल हो चुकी है।

साल 2018 के आखिर में हुए 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी इसी हकीकत को समझते-बूझते हुए मायावती ने अपनी रणनीति बुनी। उन्हें लग रहा था कि यही मौका है जब वह कांग्रेस को ज़्यादा से ज़्यादा झुका कर उससे तालमेल या गठबंधन की स्थिति में अपनी पार्टी के लिए अधिकतम सीटें छुड़वा सकती हैं।

यही सब सोचकर मायावती ने मध्य प्रदेश की 230 में से 50, राजस्थान की 200 में से 45 तथा छत्तीसगढ़ की 90 में 25 सीटें बसपा के लिए मांगी। मायावती की यह मांग कांग्रेस के लिए न तो दलीय हितों और न ही व्यावहारिक राजनीतिक के तकाजों के अनुरूप थी, लिहाजा गठबंधन नहीं हो सका।

वजह यही है कि उत्तर प्रदेश में भी गठबंधन की सुई अटकी हुई है क्योंकि भतीजे के साथ चुनावी मैदान में उतरी बुआ अपने हिस्से की 38 सीटों में एक भी कांग्रेस को नहीं देना चाहती हैं।

मतलब साफ है कि अगर यूपी में ‘बहुजन समाजवादी कांग्रेस पार्टी’ बनानी है तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ भतीजे पर होगी जो चाचा से अपनी लडाई में खुद को साबित करने के लिए जी-जान से जुटा है जिसकी पीठ पर पहले ही हाथी का भारी-भरकम बोझ है और हाथ का साथ सहारा देने के बजाये पीठ पर और दबाव देता महसूस हो रहा है।

मायावती और अखिलेश यादव यह समझते हैं कि अगर वो दोनों मिलकर चुनाव लड़ें तो भाजपा को हरा सकते हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में इन दोनों पार्टियों को लगभग उतने ही प्रतिशत वोट मिले थे जितने कि भाजपा ने हासिल किए थे। अगर इस गठबंधन में कांग्रेस और चौधरी अजीत सिंह की आरएलडी (राष्ट्रीय लोकदल पार्टी) को भी जगह मिलती तो चारों पार्टियों का वोट प्रतिशत 50 से भी ऊपर पहुंच जाता है और तब भाजपा को हराना और भी आसान लगता है।

लेकिन हाल के दिनों में बने राजनीतिक समीकरणों यानी सर्जिकल स्ट्राइक से बीजेपी के पक्ष में बना माहौल और दूसरा यूपी में प्रियंका की एंट्री से अखिलेश यहाँ असमंजस की स्थिति में है। वो उस पार्टी के साथ है जिसने पिछली लोकसभा में शून्य का अविष्कार किया था लिहाजा अपनी तरफ से उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन के रास्ते कभी बंद नहीं किये। अखिलेश पहले भी कहते रहे हैं कि कांग्रेस हमारे साथ गठबंधन में है और हमने उसके लिए 2 सीटें छोड़ दी हैं। हालाँकि ऐसा गठबंधन किसी के पल्ले नहीं पड़ा।

उधर कांग्रेस भी 15 से कम पर राजी होती नहीं दिख रही है। क्योंकि अगर सपा-बसपा से मिले पिछले ऑफर की चर्चाओं की बात करें तो गठबंधन में कांग्रेस को 8 से 9 सीटों का ऑफर मिला था जिसमे अमेठी-रायबरेली की दोनों पारिवारिक सीटें भी शामिल थीं।

यानी महागठबंधन में शामिल होकर कांग्रेस बेहतर-से-बेहतर प्रदर्शन भी करती, तो उसे रायबरेली और अमेठी से इतर अधिकतम 4-5 सीटें हासिल होतीं। लेकिन इसकी एवज में कांग्रेस की साख का बड़ा नुकसान है। तब संभवत: पीएम मोदी और शाह के हर भाषण की एक पंक्ति ये जरूर होगी कि जो पार्टी हमसे मुकाबले की बात कर रही है, केंद्र में सरकार बनाने के सपने देख रही है, वो तो यूपी को छोड़कर ही चली गई है। बीजेपी के इस आक्रमण का जवाब कांग्रेस के पास शायद ही हो।

हालाँकि अपनी महात्वाकांक्षा में आकर मायावती अगर कांग्रेस की अगुवाई को नामंजूर कर भी रही हैं, तो संभव है कि चुनाव के बाद अखिलेश अकेले भी कांग्रेस के समर्थन में आ सकते हैं। सच ये भी है कि ऐसा करने से 2022 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव के लिहाज से माया-अखिलेश के रिश्ते बेपटरी हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा राजनीति इतनी दूर की नहीं सोचती।

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